June 15, 2026

न बोल सकता, न सुन सकता, फिर भी मुनस्यारी के शमशेर के हुनर ने इंजीनियरिंग को पछाड़ा! देखिए कमाल

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खिलौनों के अंदर झांकने की आदत, फिर खुद को तराश कर बना डाले गजब के मॉडल, अब छा गए शमशेर सिंह

पिथौरागढ़: सीमांत पिथौरागढ़ जिले में एक युवक ऐसे-ऐसे प्रयोग कर रहा है. जिसे देख बड़े-बड़े इंजीनियर भी हक्के-बक्के हो रहे हैं. यह युवक न तो बोल सकता है, ना ही सुन सकता है. उसके बाद भी इसने बड़े-बड़े प्रयोग करके दिखाए हैं. इस दिव्यांग युवक के रिमोट उठाते ही इसके बनाए जहाज सच में उड़ने लगते हैं, तो जेसीबी के बकेट से मलबा उठने लगता है. गाड़ियां सामान उठाने लग जाती हैं और रोपवे चलने लग जाती है. जानिए कैसे एक मूक-बधिर दिव्यांग युवक ने इंजीनियरिंग को पछाड़ा.

बचपन से ही खिलौनों के अंदर झांकने की थी उत्सुकता: दरअसल, पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर मुनस्यारी विकासखंड का नाचनी कस्बा है. नाचनी से 12 किलोमीटर दूर राया गोल गांव में रहने वाले 30 वर्षीय शमशेर सिंह बचपन से ना बोल सकते हैं, ना सुन सकते हैं. परिवार के सदस्यों ने बताया कि शमशेर को बचपन से ही खिलौनों के अंदर झांकने की उत्सुकता रहती थी.

खिलौनों को लेकर जगी जिज्ञासा, बाद में कर दिया कमाल: दूसरे बच्चे जिन खिलौनों से खेलते थे, शमशेर उन्हें खोलकर यह समझने की कोशिश करता थे कि वे चलते कैसे हैं? धीरे-धीरे यह जिज्ञासा उसकी आदत बन गई. मशीनों और वाहनों को करीब से समझने की यही कोशिश आगे चलकर उनके हुनर की नींव बनी.

शमशेर ने कहीं से भी नहीं लिया प्रशिक्षण: बोल और सुन न पाने के बावजूद शमशेर ने चीजों को देखकर व समझकर सीखना शुरू किया. समय के साथ शमशेर ने मोबाइल पर वीडियो देखकर तकनीक को समझना शुरू किया. शमशेर ने किसी संस्थान या प्रशिक्षण केंद्र से शिक्षा नहीं ली, बल्कि खुद ही प्रयोग करते हुए सीखता गया.

कैसे तैयार किए मॉडल? गत्ते, लकड़ी, पुरानी मोटरों और स्थानीय स्तर पर मिलने वाले सामान से उसने छोटे-छोटे मॉडल बनाने शुरू किए. शमशेर की शुरूआत सबसे पहले उत्तराखंड परिवहन निगम की बस के मॉडल से हुई. इसके बाद कार, ट्रक, डंपर और जेसीबी के मॉडल तैयार किए. हर नए प्रयोग के साथ उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और उनके मॉडल पहले से ज्यादा जटिल होते गए.

12 साल पहले ही पिता भगत सिंह का हो चुका है निधन: बता दें कि शमशेर सिंह जन्म से ही सुन और बोल नहीं सकते हैं. परिवार में चार भाई-बहन हैं, जिनमें दोनों बहनों की शादी हो चुकी है. करीब 12 साल पहले पिता भगत सिंह का निधन हो गया था. इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी बड़े भाई चंद्रभानु सिंह पर आ गई, जो राजमिस्त्री का काम करते हैं. वो ही परिवार का भरण पोषण करते हैं.

8वीं के आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए शमशेर सिंह: शमशेर ने गांव के जूनियर हाईस्कूल बजेता से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की. सुनने और बोलने में असमर्थ होने के कारण आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाए. वो आज भी अपनी बात कागज पर लिखकर लोगों तक पहुंचाते हैं. आसपास की जानकारी और लोगों के संदेश भी उन्हें लिखकर ही बताए जाते हैं. सीमित शिक्षा और संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने हुनर को कभी रुकने नहीं दिया.

शमशेर ने निखारे अपने हुनर, बना डाले खास मॉडल: शमशेर के प्रयोग केवल सड़क पर चलने वाले वाहनों तक सीमित नहीं रहे. उन्होंने चैन से चलने वाले टैंक का मॉडल तैयार किया. रोपवे ट्रॉली का मॉडल बनाया और पानी में तैरने वाला घर भी तैयार किया. इसके अलावा उन्होंने पानी में चलने वाले जहाज बनाए, जिन्हें वो भुजगढ़ नदी में चलाते हैं.

शमशेर के ज्यादातर मॉडलों में लाइट, हॉर्न और इंडिकेटर भी काम करते हैं. सीमित संसाधनों में तैयार किए गए ये मॉडल उनके तकनीकी कौशल का उदाहरण माने जाते हैं. शमशेर ने अपने घर के आसपास दीवारों और खाली जगहों का उपयोग करके घुमावदार सड़कें तैयार की हैं. इन सड़कों पर उनके बनाए वाहन चलते हैं. वो रिमोट से बस, कार और ट्रक चलाते हैं. तो देखने वालों को पहाड़ के रास्तों की चुनौतियां भी समझ में आती हैं.

मॉडलों के जरिए दिखाते हैं क्या-क्या होती है चुनौतियां: मोड़ों पर वाहन कैसे मुड़ते हैं, चढ़ाई पर भारी वाहन किस तरह संघर्ष करते हैं और ड्राइवर को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, इसे वो अपने मॉडलों के जरिए दिखाने की कोशिश करते हैं. उनके लिए यह सिर्फ शौक नहीं बल्कि, पहाड़ की जिंदगी को समझाने का एक माध्यम भी है.

वायुयान का मॉडल फटने पर हुए बेहद निराश: शमशेर ने जब वायुयान का मॉडल तैयार किया, तो उसे उड़ाने के लिए काफी मेहनत की. एक बार उनका विमान कुछ ऊंचाई तक उड़ने के बाद तेज आवाज के साथ फट गया. इस घटना से वो काफी निराश हुए. जिस मॉडल को बनाने में उन्होंने लंबा समय लगाया था, उसका टूट जाना उनके लिए बड़ा झटका था. दोबारा नए प्रयोग शुरू किए और अपने काम को आगे बढ़ाते रहे.

शमशेर ने टैंक का बनाया मॉडल (फोटो सोर्स- Shamsher Singh)

परिवार के बच्चे भी हर प्रयोग के दौरान उनके साथ रहते हैं और उनका उत्साह बढ़ाते हैं. करीब दो साल पहले स्थानीय एक युवक कम्मू पहाड़ी नाम से यूट्यूब चैनल चलाने वाले एक युवक की मदद से शमशेर ने सोशल मीडिया पर अपना अकाउंट बनाया. इसके बाद उन्होंने मोबाइल से अपने बनाए मॉडलों के वीडियो अपलोड करने शुरू किए.

शमशेर के हुनर की होने लगी सराहना: धीरे-धीरे लोगों ने उनके काम को नोटिस करना शुरू किया और उनके हुनर की सराहना होने लगी. शमशेर इशारों में बताते हैं कि वो भविष्य में और बड़े स्तर पर मॉडल बनाना चाहते हैं. उनका सपना है कि दूसरे दिव्यांग युवाओं को भी यह कला सिखाएं, ताकि वे भी अपने हुनर को पहचान सकें.

मेरा बेटा भले ही सुन और बोल नहीं सकता है, लेकिन मेरे बेटे के भीतर असाधारण प्रतिभा है. यदि उसे सही सहयोग मिले, तो वो बहुत आगे जा सकता है.“- मोहिनी देवी, शमशेर की मां

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