Categories

October 3, 2026

श्राद्ध पक्ष में कौवों और गायों को क्यों खिलाया जाता है भोजन? कैसे मिलता है पितरों का आशीर्वाद, जानिए

1 min read

हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त कौवे और गाय को भोजन कराने की है परंपरा, देखिए हरिद्वार से सचिन कुमार की रिपोर्ट

हरिद्वार: सनातन धर्म में पितृ या श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों को अपने पितरों को याद करने का समय माना जाता है. श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त कौवे और गाय को भोजन कराने की परंपरा है. हरिद्वार में गंगा घाटों, मंदिरों और आसपास के क्षेत्रों में लोग कौवों एवं गायों को भोजन कराते नजर आ रहे हैं.

श्राद्ध पक्ष में लोग घरों में बनाए गए पकवानों और भोजन का कुछ हिस्सा पितरों के निमित्त निकालकर पहले कौवे और गाय को खिलाते हैं. इसके ही ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान पुण्य की परंपरा भी निभाई जाती है. धर्माचार्यों की मानें तो कौवों और गायों को भोजन कराने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है.

गायों का क्या है महत्व और क्यों कराया जाता है भोजन? हरिद्वार के नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ ही पंचबली निकालने का विधान है. शास्त्रों के अनुसार, पांचवली का अर्थ श्वान (कुत्ता), गाय, चींटी, कौवा और देवी देवताओं जैसे भगवान विष्णु एवं मां गंगा के लिए भोजन निकाला जाता है. उन्होंने बताया कि गाय में 33 कोटी देवी-देवताओं का वास होता है.

पंडित मनोज त्रिपाठी ने गाय को भोजन कराने की पीछे की वजह और मान्यता भी बताई. उनका कहना है कि अगर कोई श्राद्ध पक्ष में गायों को भोजन कराता है तो पितृ अधोगति से मुक्त हो जाते हैं. गायों को भोजन कराने से पितरों को शांति भी मिलती है. उन्होंने गाय को सभी कष्टों को हरने वाला भी बताया. पंडित मनोज त्रिपाठी कहते हैं कि,

गाय से मिलता है बहुत कुछ: भले ही गाय का धार्मिक महत्व हो, लेकिन गाय से बहुत कुछ भी मिलता है. जैसे दूध, गोबर, गौमूत्र आदि. जिसका पूजा पाठ से लेकर अन्य कामों में इस्तेमाल होता है. जबकि, दूध से दही, पनीर, घी, मक्खन, छाछ आदि तैयार होता है. गाय का शुद्ध घी पाचन में सुधार के साथ शारीरिक ऊर्जा को बढ़ाता है. वहीं, गाय का दूध पोषक तत्वों का एक पूर्ण स्रोत होता है.

गाय के दूध में पानी और ठोस पदार्थों के अलावा प्रोटीन, कैल्शियम, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज जैसे प्रमुख पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है. इसके अलावा गाय से ‘पंचगव्य‘ यानी दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर भी मिलता है. जिसे धार्मिक और आयुर्वेदिक में अहम माना गया है.

वहीं, गाय के गोबर और गोमूत्र को जैविक खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. जो खेती के लिए बेहतरीन प्राकृतिक उर्वरक होता है. गोबर, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ता है. वहीं, गाय के घी, गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल पूजा, हवन, यज्ञ समेत अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में पवित्रता के लिए किया जाता है. माना जाता है कि गाय की सेवा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. साथ ही मानसिक शांति भी मिलती है.

कौवों को भोजन कराने का क्या है महत्व? हिंदू धर्म में गाय की तरह कौवों का भी धार्मिक महत्व है. नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी ने श्राद्ध पक्ष में कौवों को भोजन कराने की पीछे की मान्यता से रूबरू करवाया. उनका कहना है कि कौवा धरती पर रहता और आकाश में उड़ता है. अगर कौवों को भोजन कराया जाता है, तो वो भोजन पितरों को भी प्राप्त हो जाता है. पंडित मनोज त्रिपाठी कहते हैं कि,

क्यों कम हो रहे कौवे? भले ही कौवों को खास मौकों के अलावा बाकी पक्षियों के मुकाबले अहमियत ना दी जाती हो, लेकिन इसके पर्यावरण में योगदान को नहीं नकारा जा सकता है. गिद्धों की तरह ही कौवे भी कुदरती सफाई कर्मी होते हैं. जो हमारे आसपास मृत जानवर, जीवों और बचे हुए खानों को खाते है. जिससे आसपास का इलाका स्वच्छ रहता है, लेकिन कौवों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है.

आजकल शहरीकरण, पेड़ों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण के चलते शहरों एवं कस्बों से कौवों की संख्या तेजी से घट रही है. आलम ये है कि कई जगहों पर तो कौवे ढूंढे से भी नहीं मिलते हैं. वैज्ञानिकों और विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण बताते हैं. सबसे बड़ा कारण पेड़ों की कटाई माना जाता है. जैसे नीम, पीपल और बरगद जैसे बड़े को पेड़ों काटा जा रहा है. जिसके चलते कौवों को घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल पा रही है.

इसके अलावा प्रदूषण और रसायन की मार भी इन पर पड़ रही है. हवा के प्रदूषण और खेती में कीटनाशकों के बेतहाशा इस्तेमाल से उनका प्राकृतिक भोजन खत्म हो रहा है. साथ ही उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है. जबकि, भोजन और पानी की कमी भी कौवों के लिए देखी गई है. आधुनिक जीवनशैली के कारण लोग अब छतों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना भूल गए हैं. बेहतर सफाई व्यवस्था और कचरे को ढककर रखने से भी इन्हें आसानी से भोजन नहीं मिल पाता है.

क्या मानना है स्थानीय लोगों का? ईटीवी भारत पर स्थानीय निवासी राजन अग्रवाल ने कौवों को भोजन कराने को शुभ बताया. साथ ही बताया कि वो कौवों (कौआ) को दाना पानी देते रहे हैं. उनका कहना है कि,

“श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं और इन दिनों कौवों को रोटी और अन्न का दान करना शुभ माना जाता है. हम पिछले पांच सालों से कौवों को रोटी और दाना पानी देते आ रहे हैं. इससे सभी काम शुभ होते हैं और पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है.“- राजन अग्रवाल, स्थानीय निवासी

वहीं, स्थानीय निवासी अतुल मैखुरी ने कौवे को पितरों का प्रतीक बताया. साथ ही गाय और कौवों को भोजन कराने की पीछे की मान्यता भी बताई. उन्होंने बताया कि,

“शास्त्रों में पढ़ा है कि कौवे को पितरों का प्रतीक माना जाता है. गाय सनातन धर्म में माता के रूप में पूजनीय है. इसी कारण हम लोग गाय और कौवे को भोजन इत्यादि देते हैं, इससे पुण्यफल की प्राप्ति होती है.“- अतुल मैखुरी, स्थानीय निवासी

वहीं, कोटद्वार से अपने पितरों की पूजा करने हरिद्वार पहुंचे अरुण शर्मा का कहना है कि पंडित जी ने उन्हें पितृ पक्ष पर गाय और कौवे को भोजन देने को कहा है. उन्होंने कहा कि,

“हरिद्वार में हमने अपने पितरों की सुख शांति और मोक्ष के लिए पूजा की है. पंडित ने हमें गाय और कौवों को भोजन देने के लिए कहा है.“- अरुण शर्मा, श्रद्धालु

गौर हो कि पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से शुरू होता है. हिंदू धर्म में पितृ पक्ष वो सोलह दिनों की अवधि होती है, जब लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करते हैं. उनकी आत्मिक शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य करते हैं. ऐसा माना जाता है कि इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और हमारा कल्याण होता है.

You may have missed