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September 24, 2026

उत्तराखंड के 98 शहरों का चमकेगा चेहरा, महायोजनाओं से बदलेगी मैदान से पहाड़ तक की तस्वीर, जानें कैसे

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उत्तराखंड सरकार जल्द पहाड़ से मैदान तक के शहरों के कायाकल्प के लिए महायोजनाओं को धरातल पर उतारने जा रही है. रिपोर्ट- किरणकांत शर्मा

देहरादून: उत्तराखंड में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, ट्रैफिक दबाव, अवैध निर्माण और बुनियादी सुविधाओं की बढ़ती जरूरतों के बीच राज्य सरकार ने शहरों के सुनियोजित विकास की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रदेश के छोटे-बड़े शहरों को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से विकसित करने के लिए कुल 98 महायोजनाएं तैयार की जा रही हैं. इन योजनाओं में देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, नैनीताल, रुड़की, रुद्रपुर और काशीपुर जैसे प्रमुख शहरों के साथ प्रदेश के पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के कई अन्य नगर भी शामिल हैं.

सरकार की योजना इन महायोजनाओं के माध्यम से शहरों के मौजूदा स्वरूप का तकनीकी आकलन करने के साथ ही अगले करीब दो दशकों में होने वाले विस्तार और आबादी के दबाव को ध्यान में रखकर विकास की दिशा तय करने की है. इन योजनाओं को मुख्य रूप से 2041 और 2045 के लक्ष्यों को सामने रखकर तैयार किया जा रहा है.

98 महायोजनाओं में अलग-अलग योजनाओं का समावेश: प्रदेश में तैयार की जा रही 98 महायोजनाओं को अलग-अलग योजनाओं और जरूरतों के आधार पर तैयार किया जा रहा है. इनमें अमृत-1 के तहत 7 और अमृत-2 के तहत 23 महायोजनाएं शामिल हैं. इसके अलावा ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के तहत सात क्लस्टरों में आने वाले 65 नगर निकायों के लिए भी महायोजनाएं तैयार की जा रही हैं. मुख्यमंत्री की घोषणाओं के तहत तीन अन्य महायोजनाओं पर भी काम किया जा रहा है. सरकार का फोकस केवल शहरों के मौजूदा ढांचे को व्यवस्थित करने तक सीमित नहीं है. बल्कि आने वाले वर्षों में शहर किस दिशा में और कितना विस्तार करेंगे? वहां कितनी आबादी होगी? यातायात का दबाव कितना बढ़ेगा? और सड़क, जल निकासी, आवास, सार्वजनिक सुविधाओं जैसी जरूरतें किस स्तर की होंगी? इन सभी पहलुओं को योजना में शामिल किया जा रहा है.

अमृत-1 ओर 2 में इन सात शहरों को किया गया शामिल: अमृत-1 के तहत राज्य के 7 प्रमुख शहरों को महायोजना के लिए चुना गया है. इनमें देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, रुद्रपुर, काशीपुर, नैनीताल और हल्द्वानी शामिल हैं. ये ऐसे शहर हैं, जहां बीते वर्षों में आबादी, यातायात, निर्माण गतिविधियों और आर्थिक गतिविधियों में लगातार बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में इन शहरों के लिए भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर जमीन के इस्तेमाल से लेकर सड़क और अन्य आधारभूत सुविधाओं तक की योजना तैयार की जा रही है. अमृत-2 के तहत प्रदेश के कई शहरों को महायोजना के दायरे में लाया गया है. इनमें पौड़ी जिले के कोटद्वार, श्रीनगर और पौड़ी, उधम सिंह नगर के जसपुर, नगला, खटीमा, किच्छा, बाजपुर, सितारगंज और गदरपुर, नैनीताल जिले के रामनगर, हरिद्वार जिले के मंगलौर और लक्सर, चंपावत के टनकपुर, चमोली के गोपेश्वर, देहरादून जिले के ऋषिकेश, डोईवाला और विकासनगर के साथ अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी और टिहरी शामिल हैं. इस तरह योजना का दायरा केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि छोटे और मध्यम आकार के नगरों को भी भविष्य के विकास की योजना में शामिल किया गया है.

GIS आधारित मास्टर प्लान से तय होगी शहरों के विकास की दिशा: सीएम धामी की मानें तो इन महायोजनाओं की सबसे अहम विशेषता GIS यानी भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित प्लानिंग है. इसके जरिए किसी शहर और उसके आसपास के क्षेत्र का केवल कागजों पर नहीं, बल्कि तकनीकी और भौगोलिक आंकड़ों के आधार पर अध्ययन किया जाएगा. किस क्षेत्र में किस तरह का निर्माण हो रहा है? जमीन का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है? यातायात का दबाव किन इलाकों में अधिक है? कहां जल निकासी की समस्या है? और भविष्य में किस क्षेत्र में विस्तार की संभावना है? इन तमाम पहलुओं को एक साथ देखकर विकास की रूपरेखा तैयार की जाएगी. इससे शहरों के विस्तार को अधिक व्यवस्थित तरीके से नियंत्रित करने और विकास कार्यों को जरूरत के अनुसार प्राथमिकता देने में मदद मिलने की उम्मीद है.

अवैध निर्माण और अव्यवस्थित शहरीकरण पर भी लगाम लगाने का लक्ष्य: महायोजना का एक बड़ा उद्देश्य शहरों में बढ़ते अव्यवस्थित निर्माण और अनियोजित शहरीकरण को नियंत्रित करना भी है. पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते निर्माण के बीच यह तय करना जरूरी हो गया है कि किस क्षेत्र में आवासीय गतिविधियां हो? कहां व्यावसायिक गतिविधियां विकसित की जाएं? और किन क्षेत्रों को पर्यावरणीय या अन्य कारणों से संरक्षित रखा जाए? GIS आधारित प्लानिंग से भूमि उपयोग का बेहतर निर्धारण किया जा सकेगा. इसके साथ ही अवैध निर्माण पर नियंत्रण यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने, ड्रेनेज सिस्टम की योजना तैयार करने और आपदा के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित करने में भी मदद मिलेगी.

पहाड़ों में भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से होगा विकास: उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति दूसरे राज्यों से अलग है. यहां मैदानी शहरों के साथ-साथ बड़ी संख्या में नगर पहाड़ी क्षेत्र भी हैं. ऐसे में एक ही तरह की विकास नीति सभी शहरों पर लागू करना व्यावहारिक नहीं है. महायोजनाओं में इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि पर्वतीय क्षेत्रों का विकास, वहां की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप हो. पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक अवसर पैदा करने, सड़क व अन्य आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर भी जोर रहेगा.

बुनियादी सुविधाओं की जरूरत का होगा आकलन: मुख्यमंत्री अपर सचिव बंशीधर तिवारी की मानें तो शहरों में बढ़ती आबादी के साथ सबसे बड़ी चुनौती यातायात और बुनियादी सुविधाओं की होती है. कई शहरों में सड़कें पुरानी आबादी और वर्तमान यातायात के हिसाब से छोटी पड़ रही हैं, जबकि बरसात के दौरान जलभराव और ड्रेनेज की समस्या भी सामने आती है. महायोजनाओं के जरिए इन समस्याओं का दीर्घकालीन समाधान खोजने की कोशिश की जा रही है.

भविष्य में किस इलाके में सड़क का विस्तार जरूरी होगा? कहां पार्किंग की आवश्यकता होगी? जल निकासी की व्यवस्था कैसे विकसित की जाए? और शहर के विस्तार के साथ सार्वजनिक सुविधाओं को किस तरह बढ़ाया जाए? इन पहलुओं को भी योजना में जगह दी जा रही है.
-बंशीधर तिवारी, अपर सचिव, मुख्यमंत्री-

विशेषज्ञ संस्थानों की मदद से तैयार हो रही महायोजना: महायोजनाओं को तैयार करने के लिए राज्य सरकार देश के प्रतिष्ठित और विशेषज्ञ संस्थानों की सहायता ले रही है. इसमें स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर (SPA) नई दिल्ली, एसपीए भोपाल, एमआईटी कालीकट, एनआईटी सूरत और एमएनआईटी जयपुर जैसे संस्थान शामिल हैं. विशेषज्ञ संस्थानों की भागीदारी का उद्देश्य शहरों की जरूरतों का तकनीकी और वैज्ञानिक अध्ययन कर ऐसी योजनाएं तैयार करना है, जिन्हें आने वाले लंबे समय तक विकास के आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके.

विजन के अनुरूप महायोजनाओं में शहरों की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नियोजित विकास पर फोकस किया गया है. महायोजना तैयार होने के बाद इससे जुड़े सभी कार्यों को निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरा करने की दिशा में काम किया जाएगा. सरकार का प्रयास है कि शहरों का विकास केवल वर्तमान समस्याओं के समाधान तक सीमित न रहे बल्कि आने वाले वर्षों की जरूरतों को भी पहले से ध्यान में रखा जाए.
-डॉ. आर राजेश कुमार, आवास सचिव-

प्रदेश के सुनियोजित और दीर्घकालीन शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए मास्टर प्लान तैयार किए जा रहा है. ये महायोजनाएं ट्रैफिक जाम, अवैध निर्माण और अव्यवस्थित शहरीकरण जैसी समस्याओं से निपटने में मदद करेंगी. साथ ही आम लोगों को बेहतर सड़कें और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में भी इन योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.
-पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखंड-

कुल मिलाकर उत्तराखंड में तैयार की जा रही ये 98 महायोजनाएं सिर्फ शहरों के नक्शे बदलने की कवायद नहीं, बल्कि अगले करीब दो दशकों के शहरी विस्तार की दिशा तय करने की कोशिश है. यदि GIS आधारित आंकड़ों स्थानीय जरूरतों और पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को जमीन पर लागू करते हुए योजनाओं को अमल में लाया जाता है तो आने वाले वर्षों में प्रदेश के शहरों के विकास को अधिक व्यवस्थित स्वरूप देने में मदद मिल सकती है. खास तौर पर छोटे और मध्यम नगरों को अभी से भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि बढ़ती आबादी और शहरीकरण का दबाव आने वाले समय में बड़ी समस्या का रूप न ले.

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